घर में जैसे ही यह खबर आती है कि परिवार में नया सदस्य आने वाला है, वैसे ही सलाह की बारिश शुरू हो जाती है। कोई कहता है यह मत खाओ, कोई कहता है ज़्यादा मत चलो, कोई कहता है मोबाइल मत चलाओ। ऐसे में दिमाग में तुरंत सवाल घूमने लगता है कि गर्भावस्था में क्या काम नहीं करना चाहिए और क्यों, और किस बात पर सच में ध्यान देना ज़रूरी है।
हर गर्भावस्था अलग होती है, लेकिन एक बात हमेशा समान रहती है कि माँ और बच्चे दोनों की सेहत पहली प्राथमिकता होती है। गलत खान-पान, बेवजह दवाएं, भारी काम या बिना सोचे समझे ब्यूटी ट्रीटमेंट कई बार ऐसे जोखिम बढ़ा सकते हैं जिन्हें थोड़ी जानकारी से टाला जा सकता है। इसलिए सिर्फ यह जानना काफी नहीं कि क्या नहीं करना, बल्कि यह समझना भी ज़रूरी है कि उसके पीछे वैज्ञानिक कारण क्या है।
भारतीय परिवारों में दादी-नानी की पारंपरिक बातें बहुत सुनी जाती हैं। इनमें से कई बातें सही भी होती हैं, लेकिन कुछ मान्यताएँ पुरानी जानकारी पर आधारित होती हैं। यहाँ संतुलन की ज़रूरत है जहाँ परंपरा और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान दोनों से मदद ली जाए। सवाल यह नहीं कि किसकी सुनी जाए, बल्कि यह है कि विश्वसनीय डॉक्टरों की सलाह के साथ क्या अपनाया जाए।
“थोड़ी सी सही जानकारी गर्भावस्था को ज़्यादा सुरक्षित और शांत बना सकती है।” – प्रसूति विशेषज्ञों की सामान्य राय
रांची के लोगों के लिए अच्छी बात यह है कि राज हॉस्पिटल्स जैसे अनुभववान सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ, शिशु रोग विशेषज्ञ और अन्य विभाग एक ही छत के नीचे उपलब्ध हैं। 27 से ज़्यादा वर्षों के अनुभव और हज़ारों माताओं की सुरक्षित डिलीवरी के साथ यहाँ की टीम गर्भावस्था से जुड़ी छोटी से छोटी बात पर भी गंभीरता से ध्यान देती है।
इस लेख में खान-पान, पेय पदार्थ, शारीरिक गतिविधि, दवाएं, सौंदर्य उपचार, यात्रा और घर के काम जैसी छह बड़ी श्रेणियों में विस्तार से बात की जाएगी। हर बिंदु पर यह भी समझाया जाएगा कि उससे बचने का वैज्ञानिक कारण क्या है। पूरा लेख पढ़ने के बाद साफ समझ आ जाएगा कि गर्भावस्था में क्या नहीं करना चाहिए, किस हद तक सावधानी ज़रूरी है, और कब बिना देरी के डॉक्टर से मिलना बेहतर रहता है।
मुख्य बातें
कई बार लंबा लेख पढ़ने से पहले ही यह जान लेना मददगार होता है कि सबसे ज़्यादा ज़रूरी बातें कौन सी हैं। नीचे दिए गए बिंदु पूरे लेख का संक्षिप्त सार हैं, जिन्हें बाद में विस्तार से समझाया जाएगा। इन्हें ध्यान में रखकर की गई छोटी सावधानियाँ भी माँ और बच्चे की सेहत के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकती हैं।
- गर्भावस्था में बचने योग्य चीजें मुख्य रूप से छह क्षेत्रों से जुड़ी होती हैं – गलत खान-पान, शराब और ज़्यादा कैफीन, भारी शारीरिक काम, बिना सलाह दवाएं, कुछ ब्यूटी ट्रीटमेंट और बिना तैयारी की यात्रा। इन क्षेत्रों में सही जानकारी होने से कई जटिलताओं का खतरा कम हो सकता है।
- कच्चा या अधपका मांस, मछली और अंडे के साथ साथ अपाश्चुरीकृत दूध और जूस में खतरनाक बैक्टीरिया हो सकते हैं। ये संक्रमण माँ में तेज बुखार, उल्टी, दस्त और गर्भपात तक का कारण बन सकते हैं। इसलिए गर्भावस्था में अच्छी तरह पका और साफ भोजन ही सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है।
- शराब की थोड़ी सी मात्रा भी बच्चे के दिमाग और शरीर के विकास पर स्थायी असर छोड़ सकती है। ज़्यादा कैफीन वाली चाय, कॉफी और सॉफ्ट ड्रिंक से भी दिल की धड़कन, रक्तचाप और गर्भपात या समय से पहले डिलीवरी का जोखिम बढ़ सकता है। पानी, नारियल पानी, नींबू पानी और छाछ जैसे साधारण पेय सबसे अच्छे माने जाते हैं।
- भारी वजन उठाने, ज़ोरदार व्यायाम, संपर्क वाले खेल और गिरने की संभावना वाली गतिविधियों से पेट और पीठ पर अनचाहा दबाव पड़ता है। इससे चोट, रक्तस्राव, प्लेसेंटा को नुकसान या समय से पहले प्रसव का खतरा पैदा हो सकता है। हल्की वॉक, प्रसव पूर्व योग और स्ट्रेचिंग जैसे सुरक्षित विकल्प बेहतर रहते हैं।
- कोई भी दवा, सप्लीमेंट, दर्द निवारक, एक्स रे या ब्यूटी ट्रीटमेंट शुरू करने से पहले स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बहुत ज़रूरी है। रांची में राज हॉस्पिटल्स की स्त्री रोग विशेषज्ञों, रेडियोलॉजी और अन्य विभागों की टीम मिलकर यह सुनिश्चित करती है कि माँ और शिशु दोनों के लिए हर जांच और उपचार सुरक्षित रहे।
गर्भावस्था में खान-पान की सावधानियां और क्या नहीं खाना चाहिए

गर्भवती महिला जो भी खाती या पीती है, वही सीधा उसके गर्भ में पल रहे बच्चे तक पहुंचता है। इस समय शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता सामान्य से थोड़ी कम रहती है, इसलिए छोटा सा संक्रमण भी बड़ा रूप ले सकता है। ऐसे में साफ, ताज़ा और पोषण से भरपूर भोजन के साथ साथ कुछ चीज़ों से दूरी बनाए रखना ज़रूरी हो जाता है।
भारतीय खाना सामान्यतः पौष्टिक होता है, लेकिन कच्ची चीज़ें, बाहर का तला-भुना स्नैक, अधपके नॉनवेज आइटम और बिना उबला दूध जैसी आदतें कई बार समस्या खड़ी कर देती हैं। इनसे होने वाले संक्रमण सिर्फ माँ तक सीमित नहीं रहते, बल्कि बच्चे के दिमाग, दिल और अन्य अंगों के विकास को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए हर गर्भवती महिला को यह समझना चाहिए कि कौन से खाद्य पदार्थ सुरक्षित हैं और कौन से नहीं।
Pregnancy Me Kya Kaam Nahi Karna Chahiye?
Pregnancy ke dauran galat aadatein, excessive physical work, stress, ya harmful foods maa aur baby dono ke liye risk create kar sakte hain. Sahi guidance se complications se bachna mumkin hai. Raj Hospital Ranchi ke maternity experts aapko safe pregnancy journey me madad karte hain.
Talk to Our Pregnancy Care Specialistकच्चा और अधपका मांस, मछली, अंडे से परहेज क्यों ज़रूरी है
कच्चे या अधपके मांस, मछली और अंडे में साल्मोनेला, लिस्टेरिया और टोक्सोप्लाज्मा जैसे जीवाणु और परजीवी पाए जा सकते हैं। ये पेट में दर्द, उल्टी, दस्त, तेज बुखार और पानी की कमी जैसे लक्षण पैदा करते हैं, जो गर्भावस्था में जल्दी बिगड़ सकते हैं। कई बार ऐसा संक्रमण गर्भपात, समय से पहले प्रसव या बच्चे के दिमाग और आँखों के स्थायी नुकसान तक का कारण बन सकता है।
घरेलू व्यंजन जैसे आधा पका ऑमलेट, कच्चे अंडे वाली मेयोनीज़ या सॉस, टिक्का या कबाब जो अंदर से गुलाबी रह जाए, इन सब से दूरी रखना समझदारी है। प्रोसेस्ड मीट जैसे सॉसेज और सलामी में भी संक्रमण और ज़्यादा नमक व प्रिज़र्वेटिव होने का खतरा रहता है, इसलिए इनका उपयोग न के बराबर रखना बेहतर है। मांस और अंडे को हमेशा इतने समय तक पकाएँ कि बीच का हिस्सा भी पूरी तरह सफेद या भूरा हो जाए और कहीं भी कच्चापन न दिखे।
उच्च पारा युक्त मछलियां और सी फूड
कुछ बड़ी समुद्री मछलियों में पारा (Mercury) की मात्रा अधिक पाई जाती है। यह पारा गर्भ में पल रहे बच्चे के तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क के विकास पर सीधा असर डाल सकता है। लंबे समय तक या ज़्यादा मात्रा में ऐसी मछलियाँ खाने से बच्चे में सीखने, बोलने और समझने में दिक्कतें देखी जा सकती हैं।
शार्क, स्वोर्डफिश, किंग मैकेरल और टाइलफिश जैसी बड़ी मछलियों से गर्भावस्था के दौरान दूर रहना बेहतर है। कम पारा वाली मछलियाँ जैसे सैल्मन या देशी नदियों की रोहू आदि सप्ताह में एक-दो बार सीमित मात्रा में ली जा सकती हैं, बशर्ते वे अच्छी तरह पकी हों। ओमेगा-3 के लिए अखरोट, अलसी और सरसों या सोया तेल जैसे अन्य सुरक्षित स्रोत भी अच्छे विकल्प माने जाते हैं।
अपाश्चुरीकृत डेयरी उत्पाद और जूस
कच्चे या बिना उबाले दूध, उससे बने पनीर या सॉफ्ट चीज़ और बिना उबाले फलों के जूस में लिस्टेरिया और ई. कोली जैसे हानिकारक जीवाणु हो सकते हैं। सामान्य लोगों में ये सिर्फ पेट खराब होने तक सीमित रहते हैं, लेकिन गर्भवती महिलाओं में यह संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। तेज बुखार, शरीर में कंपकंपी और थकान जैसे लक्षणों के साथ साथ गर्भपात या समय से पहले डिलीवरी का जोखिम भी बढ़ जाता है।
इसलिए गर्भावस्था में हमेशा उबला या पाश्चुरीकृत दूध ही लेना चाहिए और उससे बने दही, पनीर या घी पर भरोसा करना चाहिए। बाज़ार से खरीदे जाने वाले सॉफ्ट चीज़, जिन पर साफ लिखा न हो कि पाश्चुरीकृत दूध से बने हैं, उनसे दूरी बनाना समझदारी है। ताज़ा जूस भी तभी सुरक्षित माना जाता है जब साफ बर्तनों में बना हो और तुरंत पी लिया जाए, वरना उबला या पैक्ड जूस बेहतर विकल्प होता है।
कच्चा पपीता, अनानास और अन्य फल
कच्चे या आधे पके पपीते में लेटेक्स नामक पदार्थ पाया जाता है जो गर्भाशय की मांसपेशियों को सिकुड़ने के लिए उकसा सकता है। गर्भावस्था के शुरूआती महीनों में यह अनचाहे खून बहने, गर्भपात या समय से पहले दर्द शुरू होने जैसे जोखिम बढ़ा सकता है। पका हुआ पपीता सीमित मात्रा में आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है, लेकिन फिर भी डॉक्टर से पूछकर ही लेना बेहतर है, खासकर अगर पहले से कोई समस्या रही हो।
इसी तरह अनानास में मौजूद ब्रोमेलैन एंजाइम के बारे में माना जाता है कि वह गर्भाशय ग्रीवा को मुलायम कर सकता है। वैज्ञानिक रूप से अभी इस पर और शोध की ज़रूरत है, फिर भी पहली तिमाही में ज़्यादा अनानास खाने से बचने की सलाह दी जाती है। किसी भी फल को खाने से पहले साफ पानी में अच्छी तरह धोना चाहिए, ताकि मिट्टी या रसायन की परत हट जाए। सेब, केला, संतरा, अमरूद, अनार जैसे सामान्य फल, जब अच्छे से धुले हों, तो गर्भावस्था में सुरक्षित और पौष्टिक विकल्प रहते हैं।
प्रोसेस्ड, जंक फूड और चाइनीज खाना
फ्रोजन फूड, पैकेज्ड स्नैक्स और बाहर का फास्ट फूड स्वाद में भले ही अच्छा लगे, लेकिन गर्भावस्था में यह संयम से भी कम मात्रा में लेना बेहतर है। इनमें अक्सर ज़्यादा नमक, चीनी, ट्रांस फैट और प्रिज़र्वेटिव पाए जाते हैं, जबकि अच्छे पोषक तत्व बहुत कम होते हैं। ऐसे खाने से वजन तेजी से बढ़ सकता है, जिससे गर्भकालीन डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और प्रसव के समय दिक्कतें बढ़ जाती हैं।
कई चाइनीज व्यंजनों में इस्तेमाल होने वाला एमएसजी (मोनोसोडियम ग्लूटामेट) और बहुत अधिक सोया सॉस, सिरदर्द, पानी रुकने और रक्तचाप बढ़ने जैसी शिकायतें पैदा कर सकते हैं। तेज आंच पर बार-बार तले गए तेल से बने पकवानों में एक्रिलामाइड जैसे पदार्थ भी बन सकते हैं जो माँ और बच्चे दोनों के लिए अच्छे नहीं माने जाते। बेहतर है कि भूख लगने पर घर का बना हल्का नाश्ता जैसे भुना चना, मूंग की दाल का चीला, फ्रूट चाट या घर की बनी सेवइयाँ जैसे विकल्प लिए जाएँ।
नीचे की तालिका खान–पान को समझने में मदद कर सकती है:
| खाद्य पदार्थ | गर्भावस्था में सलाह |
|---|---|
| कच्चा/अधपका मांस, मछली, अंडा | इनसे परहेज करें, अच्छी तरह पकाकर ही खाएँ |
| अपाश्चुरीकृत दूध, सॉफ्ट चीज़ | न लें, केवल उबला या पाश्चुरीकृत उत्पाद चुनें |
| कच्चा पपीता, ज़्यादा अनानास | खासकर पहली तिमाही में न लें |
| घर का ताज़ा बना खाना, पके फल | नियमित रूप से लिया जा सकता है |
गर्भावस्था में पेय पदार्थों से परहेज और शराब व कैफीन

गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त पानी पीना शरीर और बच्चे दोनों के लिए बहुत ज़रूरी होता है। पानी की कमी से चक्कर, थकान, कब्ज और पेशाब के संक्रमण जैसी दिक्कतें बढ़ सकती हैं। लेकिन हाइड्रेशन के नाम पर हर तरह के पेय सुरक्षित नहीं होते, कुछ पेय तो सीधे बच्चे के विकास पर चोट पहुँचा सकते हैं।
हमारे देश में चाय, कॉफी, सॉफ्ट ड्रिंक और कभी-कभी एनर्जी ड्रिंक पीने की आदत आम है। इसके अलावा कुछ लोग तनाव या पार्टियों में शराब भी लेते हैं, जिसकी आदत गर्भावस्था में तुरंत छोड़ना ज़रूरी हो जाता है। सही जानकारी के साथ अगर शुरुआत में ही थोड़ी सतर्कता रखी जाए, तो आगे चलकर कई समस्याओं से आसानी से बचा जा सकता है।
शराब का पूर्ण परहेज क्यों अनिवार्य है
शराब गर्भावस्था में सबसे ज़्यादा खतरनाक पदार्थों में से एक मानी जाती है। यह सीधे माँ के खून से प्लेसेंटा के माध्यम से बच्चे तक पहुँचती है और उसके नाज़ुक दिमाग और अंगों पर असर डालती है। इसी वजह से फीटल अल्कोहल सिंड्रोम नाम की स्थिति देखी जाती है जिसमें बच्चे के चेहरे की बनावट, दिल, दिमाग और सीखने की क्षमता पर स्थायी असर पड़ सकता है।
ऐसे बच्चों में जन्म के समय वजन कम होना, बढ़त धीमी रहना, ध्यान न लगा पाना, गुस्सा जल्दी आना और पढ़ाई में लगातार दिक्कत जैसी समस्याएँ ज़्यादा देखी जाती हैं। दुनिया भर के प्रसूति विशेषज्ञ संगठनों, जैसे American College of Obstetricians and Gynecologists, की राय एक जैसी है कि गर्भावस्था में शराब की कोई भी मात्रा सुरक्षित नहीं मानी जा सकती। इसलिए चाहे पहले से थोड़ी मात्रा की आदत रही हो, प्रेग्नेंसी की योजना बनाते ही और पुष्टि होते ही शराब से पूरी तरह दूरी बना लेना सबसे समझदारी भरा कदम है।
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Talk to Our Pregnancy Care Specialist“प्रेग्नेंसी के दौरान शराब की सुरक्षित मात्रा शून्य मानी जाती है।” – अंतरराष्ट्रीय प्रसूति दिशानिर्देशों का निष्कर्ष
कैफीन की सीमित मात्रा और इसके स्रोत
कैफीन एक तरह का उत्तेजक पदार्थ है जो दिल की धड़कन और रक्तचाप दोनों को बढ़ा सकता है। यह भी प्लेसेंटा से होकर बच्चे तक पहुँच जाता है, जबकि बच्चे का शरीर इसे तोड़ने और बाहर निकालने में सक्षम नहीं होता। रिसर्च के आधार पर अधिकतर विशेषज्ञ यह सलाह देते हैं कि गर्भवती महिला दिन भर में कुल मिला कर लगभग 200 मिलीग्राम से अधिक कैफीन न ले।
कैफीन सिर्फ कॉफी में नहीं बल्कि कड़क चाय, ग्रीन टी, कोला, एनर्जी ड्रिंक और चॉकलेट में भी पाया जाता है। ज़्यादा कैफीन से गर्भपात, समय से पहले डिलीवरी और बच्चे का वजन कम रहने का जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है। इसलिए:
- दिन में एक हल्की चाय या कॉफी तक सीमित रहें।
- डिकैफिनेटेड विकल्प अपनाएँ तो बेहतर है।
- बाकी समय नींबू पानी, नारियल पानी, सादा पानी या हर्बल पेय का चुनाव करें।
भारतीय परिवारों में अगर दिन में कई बार चाय पीने की आदत हो तो उसकी जगह गुनगुना पानी, सूप या छाछ लेना अच्छा विकल्प हो सकता है।
आर्टिफिशियल स्वीटनर और एलोवेरा जूस
कई लोग चीनी से बचने के लिए आर्टिफिशियल स्वीटनर का इस्तेमाल करते हैं। सामान्य तौर पर थोड़ी मात्रा में इनका उपयोग सुरक्षित माना जाता है, लेकिन अगर किसी को फेनिलकेटोनुरिया नाम की आनुवंशिक बीमारी हो तो कुछ स्वीटनर खतरनाक हो सकते हैं। इसलिए गर्भावस्था में, खासकर अगर पहले से कोई बीमारी हो, तो मीठा या डाइट प्रोडक्ट चुनने से पहले डॉक्टर या डाइटिशियन से पूछ लेना बेहतर है।
एलोवेरा जूस कई जगह पेट साफ रखने या सौंदर्य से जुड़े लाभ के नाम पर पिया जाता है। लेकिन इसके गूदे में मौजूद एंथ्राक्विनोन नामक पदार्थ आंतों को ज़्यादा उत्तेजित कर सकता है और गर्भाशय की मांसपेशियों में भी संकुचन बढ़ा सकता है। इससे पेट दर्द, दस्त और गर्भपात तक का जोखिम बढ़ जाता है, इसलिए गर्भावस्था में एलोवेरा का सेवन न ही किया जाए तो अच्छा है। त्वचा पर लगाई जाने वाली एलोवेरा जेल या क्रीम सामान्यतः सुरक्षित मानी जाती है, फिर भी कोई नया उत्पाद शुरू करने से पहले डॉक्टर से पूछ लेना समझदारी है।
शारीरिक गतिविधियां और व्यायाम में सावधानियां

गर्भावस्था में हल्की और नियमित शारीरिक गतिविधि माँ और बच्चे दोनों के लिए फायदेमंद रहती है। यह वजन को नियंत्रित रखने, पीठ दर्द कम करने, नींद अच्छी आने और डिलीवरी के दौरान शरीर को मदद करने में सहायक हो सकती है। लेकिन हर तरह की एक्सरसाइज हर महिला और हर तिमाही के लिए सही नहीं होती, कुछ गतिविधियाँ सीधे पेट और पीठ पर अनचाहा दबाव बढ़ा सकती हैं।
इसलिए ज़रूरी है कि व्यायाम बंद न किया जाए, बल्कि उसे समझदारी से बदला जाए। तेज दौड़ना, कूदना या भिड़ंत वाले खेल छोड़कर, वॉक, हल्का स्ट्रेच, प्रसव पूर्व योग या तैराकी जैसे सुरक्षित विकल्प चुने जा सकते हैं। राज हॉस्पिटल्स में स्त्री रोग विशेषज्ञ और फिजियोथेरेपिस्ट मिलकर मिलकर कई माताओं को उनकी सेहत और तिमाही के अनुसार सही व्यायाम की सलाह देते हैं।
“प्रेग्नेंसी के दौरान सही तरीके से किया गया हल्का व्यायाम अक्सर दवा से ज़्यादा मदद कर सकता है।” – प्रसूति एवं फिजियोथेरेपी विशेषज्ञों की साझा राय
भारी वजन उठाना और झुकने से परहेज
गर्भवती होने पर पेट के निचले हिस्से और कमर पर पहले से ही अतिरिक्त भार आ जाता है। ऐसे में अगर कोई लगातार भारी बाल्टी, गैस सिलेंडर, बड़े बैग या बच्चे को लंबे समय तक गोद में उठाती रहे तो मांसपेशियों पर और ज़ोर पड़ता है। इससे पीठ दर्द बढ़ सकता है, पैल्विक क्षेत्र में खिंचाव महसूस हो सकता है और किसी गलत हरकत से अचानक चोट या रक्तस्राव भी हो सकता है।
अगर किसी सामान को ज़रूर उठाना पड़े तो तरीका बदलना ज़रूरी है।
- सीधे कमर से झुकने की बजाय घुटनों को मोड़कर नीचे बैठकर सामान उठाएँ।
- शरीर से सटा कर हल्का वजन उठाएँ, हाथ पूरी तरह फैलाकर दूर तक न पकड़ें।
- शुरूआती महीनों में भी तीन–चार किलो से ज़्यादा न उठाएँ; आगे के महीनों में यह सीमा और कम हो सकती है, इसलिए अपने डॉक्टर से व्यक्तिगत सलाह लेना सही रहता है।
किसी भी तरह का तेज दर्द, चक्कर या पेट में खिंचाव महसूस होते ही भारी काम तुरंत छोड़ देना चाहिए और ज़रूरत लगे तो डॉक्टर से मिलना चाहिए।
संपर्क वाले खेल और गिरने का खतरा
फुटबॉल, बास्केटबॉल, कबड्डी या तेज बैडमिंटन जैसे खेलों में दूसरे खिलाड़ियों से टकराने या अचानक गिरने की संभावना रहती है। प्रेग्नेंसी के दौरान ऐसी कोई भी चोट सीधे पेट पर लग जाए तो बच्चे और प्लेसेंटा दोनों के लिए खतरनाक हो सकती है। गिरने से अंदरूनी रक्तस्राव, पानी की थैली समय से पहले फटना या प्रसव दर्द शुरू हो जाना जैसे जोखिम बढ़ जाते हैं।
जैसे-जैसे पेट बढ़ता है, शरीर का संतुलन भी थोड़ा बदल जाता है, जिससे सीढ़ी, ढलान या गीली सतह पर फिसलने का खतरा सामान्य से ज़्यादा हो जाता है। घुड़सवारी, स्कीइंग, ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर साइकिल चलाना या ज़्यादा स्पीड पर दो पहिया वाहन चलाना भी इसी वजह से सुरक्षित नहीं माना जाता। इसकी जगह आराम से टहलना, गर्भावस्था के लिए सुरक्षित योगासन और ज़रूरत हो तो प्रशिक्षित शिक्षक के साथ प्रसव पूर्व व्यायाम क्लास बेहतर विकल्प हैं।
अत्यधिक गर्मी से बचना, व्यायाम और गर्म स्नान
व्यायाम या गर्म पानी में लंबे समय तक रहने से अगर शरीर का तापमान बहुत बढ़ जाए तो यह गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास पर असर डाल सकता है। शुरुआती महीनों में तो दिमाग और रीढ़ की हड्डी बन रही होती है, ऐसे समय में ज़्यादा गर्मी न्यूरल ट्यूब संबंधी दोषों का खतरा बढ़ा सकती है। इसलिए हॉट टब, सौना, स्टीम रूम या बहुत गर्म पानी से लंबे समय तक नहाने से दूरी बनाना अच्छा रहता है।
नहाने के लिए हल्का गुनगुना पानी चुनना बेहतर है जिसमें शरीर को आराम मिले लेकिन पसीना न आए। व्यायाम के समय हल्के, ढीले और सांस लेने योग्य कपड़े पहनने चाहिए और बीच-बीच में पानी पीते रहना चाहिए। बहुत गर्म और उमस भरे मौसम में दोपहर के समय बाहर तेज वॉक या एक्सरसाइज करने की बजाय सुबह या शाम का समय चुनना ज़्यादा सुरक्षित माना जाता है।
पेट के बल लेटने और विशिष्ट व्यायाम
पहली तिमाही के बाद जब पेट उभरना शुरू हो जाता है, तब पेट के बल लेटना असुविधाजनक तो लगता ही है, साथ ही यह सुरक्षित भी नहीं माना जाता। दूसरी और तीसरी तिमाही में देर तक पीठ के बल सीधा लेटे रहने से भी पेट के अंदर की बड़ी नसों पर दबाव पड़ सकता है। इससे दिमाग और गर्भाशय तक जाने वाला रक्त प्रवाह कम हो सकता है, जिसका असर माँ और बच्चे दोनों पर पड़ता है।
इसलिए व्यायाम करते समय ऐसी स्थिति चुनना बेहतर है जिसमें बाईं करवट लेटकर, बैठकर या खड़े होकर हल्की गतिविधि की जाए। केगल एक्सरसाइज, जिसमें पेशाब रोकने वाली मांसपेशियों को थोड़ी देर कस कर फिर ढीला छोड़ते हैं, प्रसव के बाद पेशाब पर नियंत्रण और पेल्विक फ्लोर की मजबूती के लिए मददगार होती है। धीरे-धीरे गहरी सांस लेने और छोड़ने के अभ्यास भी डिलीवरी के समय दर्द को संभालने में सहारा दे सकते हैं।
दवाएं और चिकित्सकीय प्रक्रियाओं में सावधानी

गर्भावस्था के दौरान ली जाने वाली ज्यादातर दवाएं, चाहे वे सामान्य दर्द की हों या लंबे समय से चल रही बीमारी की, किसी न किसी रूप में प्लेसेंटा के जरिये बच्चे तक पहुँच सकती हैं। कुछ दवाएं बिल्कुल सुरक्षित होती हैं, कुछ सीमित मात्रा में ठीक मानी जाती हैं और कुछ का उपयोग सख्त निषेध होता है। आम व्यक्ति के लिए इन्हें पहचान पाना आसान नहीं होता, इसलिए इस समय खुद से दवा लेना बड़ा जोखिम माना जाता है।
कई बार सरदर्द, सर्दी, खांसी या हल्का बुखार जैसी छोटी शिकायतें भी परेशान कर देती हैं और आदत के कारण लोग तुरंत दवाई खा लेते हैं। गर्भावस्था में ऐसा करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि थोड़ी सी भी गलती बच्चे के दिल, गुर्दे या दिमाग के विकास पर असर डाल सकती है। राज हॉस्पिटल्स में प्रसूति रोग विशेषज्ञ, मेडिसिन, रेडियोलॉजी और डेंटल विभाग मिलकर यह ध्यान रखते हैं कि ज़रूरी दवाएं और जांच भी इस तरह की जाएँ कि माँ और शिशु दोनों सुरक्षित रहें।
बिना पर्ची की दवाएं और दर्द निवारक
ओवर द काउंटर (OTC) मिलने वाली कई दवाएं सामान्य दिनों में भले ही हानिरहित लगें, पर गर्भावस्था में इनका असर अलग हो सकता है। जैसे लंबे समय तक या ज़्यादा मात्रा में आइबुप्रोफेन और एस्पिरिन लेने से बच्चे के दिल और गुर्दे के विकास पर असर पड़ने की आशंका रहती है। कुछ दवाएं गर्भ के आखिरी महीनों में बच्चे के फेफड़ों और दिल के बीच मौजूद नस के समय से पहले बंद हो जाने जैसी स्थिति पैदा कर सकती हैं।
सर्दी-जुकाम की कई दवाओं में भी ऐसे घटक होते हैं जो रक्तचाप बढ़ा सकते हैं या नींद बहुत ला सकते हैं। सामान्यतया हल्के बुखार या दर्द के लिए सीमित मात्रा में पैरासिटामोल को सुरक्षित विकल्प माना जाता है, लेकिन इसे भी सिर्फ डॉक्टर की बताई डोज और समय तक ही लेना चाहिए। गैस, एसिडिटी या कब्ज की दवाओं में भी हर ब्रांड सुरक्षित नहीं होता, इसलिए कोई भी सिरप या टैबलेट शुरू करने से पहले अपने स्त्री रोग विशेषज्ञ या राज हॉस्पिटल्स के फार्मासिस्ट से पूछ लेना बेहतर है।
एंटीडिप्रेसेंट और मानसिक स्वास्थ्य दवाएं
कई महिलाएँ पहले से डिप्रेशन, एंग्जाइटी या अन्य मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दवाएं ले रही होती हैं और गर्भधारण के बाद घबरा कर अचानक दवा बंद कर देती हैं। ऐसा करना खुद माँ के लिए भी खतरनाक हो सकता है, क्योंकि अचानक दवा छोड़ने से लक्षण और ज़्यादा बढ़ सकते हैं, नींद खराब हो सकती है और कभी-कभी आत्मघाती विचार भी आ सकते हैं। माँ की मानसिक सेहत ठीक न हो तो उसका असर सीधे बच्चे की देखभाल और स्तनपान पर भी पड़ता है।
इसलिए यदि कोई महिला पहले से एंटीडिप्रेसेंट या अन्य मनोचिकित्सीय दवा ले रही हो तो जैसे ही गर्भावस्था की जानकारी मिले, तुरंत अपने मनोचिकित्सक और स्त्री रोग विशेषज्ञ दोनों से मिलना चाहिए। कई दवाओं के ऐसे विकल्प उपलब्ध हैं जिन्हें प्रेग्नेंसी में अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है या जिनकी मात्रा धीरे-धीरे घटाई जा सकती है। साथ ही परामर्श, काउंसलिंग और सपोर्ट ग्रुप जैसी गैर दवा विधियाँ भी मददगार हो सकती हैं, जिनकी सुविधा राज हॉस्पिटल्स जैसे अस्पतालों में उपलब्ध रहती है।
एक्स रे, रेडिएशन और डेंटल प्रक्रियाएं
एक्स रे और कुछ अन्य इमेजिंग तकनीकों में जो विकिरण प्रयोग किया जाता है, वह विकासशील भ्रूण के लिए हानिकारक हो सकता है, खासकर शुरुआती महीनों में। इसी वजह से गर्भवती महिलाओं में सामान्य जांच के लिए एक्स रे से बचने की कोशिश की जाती है और केवल बहुत ज़रूरी होने की स्थिति में ही इसे किया जाता है। उस समय भी पेट के हिस्से को विशेष शील्ड से ढक कर बच्चे को बचाने की कोशिश की जाती है।
दांतों की नियमित जांच और सफाई गर्भावस्था में न सिर्फ सुरक्षित बल्कि ज़रूरी भी मानी जाती है, क्योंकि मसूड़ों की बीमारी का संबंध समय से पहले डिलीवरी से जोड़ा गया है। हाँ, डेंटल एक्स रे या बड़े उपचार जिन्हें टाला जा सकता हो, उन्हें दूसरी तिमाही तक स्थगित कर देना बेहतर रहता है। राज हॉस्पिटल्स जैसे केंद्रों पर रेडियोलॉजी और डेंटल टीम गर्भावस्था की जानकारी मिलते ही आपकी जांच योजना को उसी के अनुसार बदल देती है, ताकि ज़रूरी जांच भी हो जाए और बेवजह का जोखिम भी न लिया जाए।
सौंदर्य और व्यक्तिगत देखभाल में सावधानियां
गर्भावस्था के दौरान शरीर में हार्मोन का स्तर बहुत बदलता है, जिसका असर सीधे त्वचा और बालों पर भी दिखता है। किसी को झाईंया, किसी को मुहांसे, किसी को बाल झड़ने की शिकायत, तो किसी को अचानक बहुत घने बाल होने लगते हैं। ऐसे समय पर हर महिला चाहती है कि वह खुद को अच्छा महसूस करे और सामान्य दिनों की तरह ही साफ-सुथरी और सजी-धजी दिखे।
समस्या तब होती है जब ब्यूटी पार्लर या घर पर इस्तेमाल होने वाले उत्पादों में मौजूद रसायन, रंग या तेज खुशबू वाला तेल गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए सुरक्षित न हों। ज़्यादातर चीज़ें त्वचा से बहुत कम मात्रा में ही शरीर में जाती हैं, लेकिन फिर भी कुछ पदार्थों को लेकर संदेह बना रहता है। इसलिए सावधानी का रास्ता चुनते हुए हल्के, प्राकृतिक या डॉक्टर द्वारा सुझाए गए उत्पादों का उपयोग करना सबसे बेहतर माना जाता है।
हेयर डाई और रासायनिक हेयर ट्रीटमेंट
बालों को रंगने के लिए इस्तेमाल होने वाली डाई में अलग-अलग तरह के रसायन होते हैं जो थोड़ी मात्रा में खोपड़ी की त्वचा से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। रिसर्च के अनुसार सामान्य उपयोग से बहुत बड़ा खतरा साबित नहीं हुआ, फिर भी कई विशेषज्ञ सावधानी के तौर पर गर्भावस्था की पहली तिमाही खत्म होने के बाद ही हेयर कलर कराने की सलाह देते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि शुरुआती महीनों में बच्चे के अंग बन रहे होते हैं और उस समय किसी भी अनावश्यक रसायन से दूरी रखना बेहतर माना जाता है।
अगर हेयर डाई करानी ही हो तो अमोनिया मुक्त या हल्के रसायन वाली डाई चुनना बेहतर है। प्राकृतिक मेहंदी, कॉफी या चाय से बने घरेलू पैक जैसे उपाय भी अच्छे विकल्प हो सकते हैं, बशर्ते उनमें मिलाए गए अन्य केमिकल सुरक्षित हों। हेयर स्ट्रेटनिंग, रीबॉन्डिंग या बहुत तेज स्मूदनिंग ट्रीटमेंट में कई तरह के मजबूत रसायन और धुएँ का उपयोग होता है, इसलिए गर्भावस्था में इन्हें टाल देना ही समझदारी है, खासकर अगर कमरा बंद हो और वेंटिलेशन कम हो।
एसेंशियल ऑयल्स और अरोमाथेरेपी
एसेंशियल ऑयल्स की खुशबू और मालिश सामान्य दिनों में आराम और रिलैक्सेशन के लिए काफी लोकप्रिय हो चुकी है। लेकिन गर्भावस्था में हर तेल सुरक्षित नहीं माना जाता, क्योंकि कुछ तेल गर्भाशय की मांसपेशियों को उत्तेजित कर सकते हैं। रोजमेरी, सेज, थाइम और जूनिपर जैसे तेलों के बारे में माना जाता है कि वे संकुचन बढ़ा सकते हैं, इसलिए इनसे दूरी रखना बेहतर है।
कुछ हल्के तेल जैसे लैवेंडर या नींबू के तेल को सीमित मात्रा में और किसी कैरियर ऑयल में अच्छी तरह मिलाकर इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन यह भी सिर्फ डॉक्टर या प्रशिक्षित अरोमा थेरेपिस्ट की सलाह के बाद ही करना चाहिए। किसी भी नए तेल को लगाते समय पहले छोटी सी जगह पर पैच टेस्ट कर लेना जरूरी है, ताकि एलर्जी या रैशेज़ का पता चल सके। गर्भावस्था के दौरान मालिश हमेशा ऐसी जगह करवाएँ जहाँ विशेषज्ञ को प्रेग्नेंसी मसाज के सुरक्षित प्रेशर पॉइंट्स और प्रतिबंधों की जानकारी हो।
वैक्सिंग, इलेक्ट्रोलिसिस और लेजर ट्रीटमेंट
शरीर के अनचाहे बालों को हटाने के लिए वैक्सिंग एक आम तरीका है और गर्भावस्था में भी इसे सामान्यतः सुरक्षित माना जाता है। हालांकि हार्मोनल बदलावों के कारण त्वचा अधिक संवेदनशील हो सकती है, जिसके कारण दर्द और जलन पहले से ज़्यादा महसूस हो सकती है। इसलिए बहुत गर्म वैक्स, बार-बार एक ही जगह खींचने या पहले से कटे-फटे हिस्से पर वैक्सिंग करने से बचना चाहिए।
इलेक्ट्रोलिसिस में बहुत पतली सुई और हल्के विद्युत प्रवाह का उपयोग होता है, जिसकी प्रेग्नेंसी में सुरक्षा को लेकर पर्याप्त अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए अधिकतर विशेषज्ञ इससे बचने की राय देते हैं। इसी तरह लेजर हेयर रिमूवल के बारे में भी गर्भवती महिलाओं पर ठोस रिसर्च कम है, इसलिए इसे बाद के लिए टाल देना ही बेहतर है। शेविंग या हल्के ट्रिमर का उपयोग सबसे सुरक्षित और आसान विकल्प माना जाता है, बशर्ते ब्लेड साफ और नया हो। सनबेड या टैनिंग बेड जैसे उपाय तो सामान्य समय में भी त्वचा के लिए अच्छे नहीं हैं, गर्भावस्था में तो उनसे दूरी रखना ही सही है क्योंकि इस समय त्वचा पहले से ज्यादा संवेदनशील होती है।
यात्रा और परिवहन में सुरक्षा उपाय
गर्भधारण का मतलब यह नहीं कि पूरा समय बिस्तर पर ही बिताना पड़े, अधिकतर स्वस्थ गर्भावस्थाओं में तय योजना के साथ यात्रा करना संभव होता है। लेकिन यह भी सच है कि लंबी यात्रा, झटकेदार सफर या दूरदराज़ इलाकों में अचानक मेडिकल मदद न मिल पाने से जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए यात्रा की योजना हमेशा डॉक्टर से सलाह लेकर और अपनी तिमाही को ध्यान में रखकर बनानी चाहिए।
अधिकतर महिलाओं के लिए दूसरी तिमाही यानी चौदह से अट्ठाईस सप्ताह का समय यात्रा के लिए अपेक्षाकृत आरामदायक रहता है। इस समय शुरुआती मितली कम हो चुकी होती है और पेट इतना बड़ा नहीं होता कि बहुत असुविधा हो। चाहे हवाई यात्रा हो, ट्रेन हो या कार, हर तरह के सफर में सीट बेल्ट का सही उपयोग, बीच-बीच में चलकर पैर हिलाना और पर्याप्त पानी पीना बहुत जरूरी है।
हवाई यात्रा के नियम और सावधानियां
अधिकांश एयरलाइंस गर्भावस्था के छत्तीसवें सप्ताह के बाद घरेलू उड़ान की अनुमति नहीं देतीं और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए यह सीमा कई बार और कम होती है। कई कंपनियाँ बत्तीस सप्ताह के बाद डॉक्टर का फिटनेस सर्टिफिकेट भी माँगती हैं जिसमें यह लिखा हो कि माँ और बच्चा दोनों फिलहाल यात्रा के लिए स्थिर हैं। इसलिए टिकट बुक करने से पहले एयरलाइन की नीति पढ़ लेना और अपने स्त्री रोग विशेषज्ञ से लिखित सलाह ले लेना समझदारी है।
लंबी उड़ान के दौरान एक ही जगह लगातार बैठे रहने से पैरों में सूजन और खून के थक्के बनने का खतरा बढ़ सकता है। इससे बचने के लिए:
- हर एक–दो घंटे में कुछ देर गलियारे में चलें।
- पैरों और टखनों को समय-समय पर मोड़कर–सीधा कर के हिलाएँ।
- खूब पानी पीएँ और कैफीन व सोडा से दूरी रखें।
सीट बेल्ट लगाते समय उसका निचला हिस्सा पेट के नीचे कूल्हों पर और ऊपर वाला हिस्सा सीने के बीच से रखा जाना चाहिए, ताकि किसी झटके की स्थिति में पेट पर सीधा दबाव न पड़े। जिन महिलाओं को पहले से हाई ब्लड प्रेशर, प्रीएक्लेम्प्सिया, बार-बार रक्तस्राव या समय से पहले प्रसव का जोखिम हो, उन्हें हवाई यात्रा से पहले राज हॉस्पिटल्स जैसे केंद्र के विशेषज्ञों से विस्तार से चर्चा कर ही निर्णय लेना चाहिए।
कार या ट्रेन से यात्रा करते समय भी अचानक ब्रेक, गड्ढों या झटकों से बचने की कोशिश करनी चाहिए। बहुत लंबी दूरी के लिए बीच-बीच में रुककर थोड़ी वॉक करना, हल्का नाश्ता रखना और मेडिकल रिपोर्ट की फाइल तथा डॉक्टर का संपर्क नंबर साथ रखना अच्छा रहता है। विदेश यात्रा की स्थिति में ज़रूरी टीकों, बीमा और वहाँ की मेडिकल सुविधाओं के बारे में पहले से जानकारी लेना और अपने स्त्री रोग विशेषज्ञ से इस पर चर्चा करना जरूरी है।
निष्कर्ष
गर्भावस्था जीवन का बेहद भावनात्मक और संवेदनशील चरण होता है, जहाँ हर दिन उत्साह और हल्की चिंता दोनों साथ चलते हैं। इस समय गर्भावस्था में क्या काम नहीं करना चाहिए और क्यों यह समझ लेना उतना ही जरूरी है, जितना यह जानना कि क्या खाना और क्या करना फायदेमंद है। जब किसी चीज़ से परहेज का वैज्ञानिक कारण समझ में आ जाता है, तो उस सलाह को मानना भी आसान हो जाता है और मन में अनावश्यक डर भी नहीं रहता।
हमने देखा कि कच्चा या अधपका भोजन, अपाश्चुरीकृत डेयरी, शराब, ज्यादा कैफीन, भारी वजन, तेज खेल, बिना सलाह की दवाएं, कुछ ब्यूटी ट्रीटमेंट और बिना तैयारी की लंबी यात्रा ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ थोड़ी सी लापरवाही भी समस्या बढ़ा सकती है। दूसरी ओर, साफ-सुथरा घर का खाना, पर्याप्त पानी, हल्की एक्सरसाइज, सही बैठने और लेटने की मुद्रा, डॉक्टर की सलाह से ली गई दवाएं और सोची-समझी यात्रा, माँ और बच्चे दोनों के लिए सुरक्षा की ढाल बन जाती हैं।
हर महिला की सेहत, उम्र, पहले की गर्भावस्था और मौजूदा रिपोर्ट अलग होती हैं, इसलिए इंटरनेट या रिश्तेदारों की सामान्य सलाह से ज़्यादा भरोसा अपने स्त्री रोग विशेषज्ञ की सलाह पर करना चाहिए। रांची और आसपास के परिवारों के लिए राज हॉस्पिटल्स में अनुभवी डॉक्टरों, आधुनिक जांच सुविधाओं और चौबीसों घंटे आपातकालीन देखभाल की उपलब्धता एक बड़ा सहारा है। यदि प्रेग्नेंसी के दौरान किसी भी काम, दवा या लक्षण को लेकर मन में ज़रा भी सवाल आए तो उसे अनदेखा करने की बजाय समय रहते विशेषज्ञ से मिलना ही सबसे सुरक्षित और समझदार निर्णय होता है।
Pregnancy Me Kya Kaam Nahi Karna Chahiye?
Pregnancy ke dauran galat aadatein, excessive physical work, stress, ya harmful foods maa aur baby dono ke liye risk create kar sakte hain. Sahi guidance se complications se bachna mumkin hai. Raj Hospital Ranchi ke maternity experts aapko safe pregnancy journey me madad karte hain.
Talk to Our Pregnancy Care Specialistगर्भावस्था में पूरी तरह बिस्तर पर आराम करना ज़रूरी होता है क्या
हर गर्भावस्था में पूरा समय बिस्तर पर लेटे रहना ज़रूरी नहीं होता। ज्यादातर स्वस्थ प्रेग्नेंसी में हल्का घर का काम, सामान्य चाल से चलना और डॉक्टर द्वारा सुझाया गया व्यायाम बिल्कुल ठीक माना जाता है। सिर्फ कुछ विशेष स्थितियों जैसे प्लेसेंटा की समस्या, बार-बार रक्तस्राव या समय से पहले दर्द में ही सख्त बेड रेस्ट की सलाह दी जाती है। इसलिए यह फैसला हमेशा डॉक्टर से मिलकर ही लेना चाहिए।
क्या मैं गर्भावस्था में जिम जा सकती हूँ
अगर पहले से नियमित एक्सरसाइज की आदत हो और गर्भावस्था बिना जटिलता के चल रही हो, तो डॉक्टर हल्की जिम एक्टिविटी की अनुमति दे सकते हैं। लेकिन भारी वजन, कूदने वाले व्यायाम, एब्डॉमिनल क्रंच और बहुत तेज कार्डियो से दूरी बनानी पड़ती है। जिम ट्रेनर को भी प्रेग्नेंसी के बारे में बताना जरूरी है, ताकि वह सुरक्षित वर्कआउट चुन सके। किसी भी नई परेशानी जैसे चक्कर, सांस फूलना या पेट में तेज खिंचाव महसूस होते ही एक्सरसाइज तुरंत रोक देनी चाहिए।
प्रेग्नेंसी में क्या मैं कभी-कभी बाहर का खाना खा सकती हूँ
साफ-सुथरे और भरोसेमंद रेस्टोरेंट में कभी-कभी पूरी तरह पका हुआ हल्का खाना लेना आमतौर पर ठीक माना जाता है। लेकिन कच्चा सलाद, क्रीम या मेयोनीज़ वाले व्यंजन, स्ट्रीट फूड, ज़्यादा तला हुआ या बहुत मसालेदार खाना गर्भावस्था में पेट और आंतों को परेशान कर सकता है। अगर पहले से गैस, एसिडिटी या उल्टी की समस्या हो तो घर का ताज़ा बना हल्का भोजन ही सबसे अच्छा विकल्प रहता है। किसी भी तरह के फूड पॉइजनिंग के लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
क्या मोबाइल फोन और वाई-फाई से बच्चे को नुकसान पहुँचता है
अब तक किए गए शोधों में सामान्य उपयोग की स्थिति में मोबाइल या वाई-फाई से गर्भस्थ शिशु को गंभीर नुकसान का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला है। फिर भी कई विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि फोन को लंबे समय तक पेट के बिल्कुल पास न रखें और बहुत देर तक कॉल करनी हो तो हैंड्स-फ्री या स्पीकर मोड का उपयोग किया जाए। सोते समय फोन को सिर के पास रखने की बजाय थोड़ी दूरी पर रखना भी अच्छा माना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्क्रीन टाइम इतना न बढ़ जाए कि नींद, खाना या व्यायाम पर असर पड़े।
गर्भावस्था में सही जानकारी और देखभाल के लिए कहाँ संपर्क करें
सबसे अच्छा स्रोत हमेशा प्रशिक्षित स्त्री रोग विशेषज्ञ और पंजीकृत अस्पताल ही होते हैं। रांची और आसपास के परिवार राज हॉस्पिटल्स में प्रसूति एवं स्त्री रोग, शिशु रोग, रेडियोलॉजी और इमरजेंसी विभाग की संयुक्त टीम पर भरोसा कर सकते हैं। यहाँ पर प्रेग्नेंसी की नियमित जांच, अल्ट्रासाउंड, पोषण परामर्श, प्रसव पूर्व कक्षाएँ और डिलीवरी की आधुनिक सुविधाएँ एक ही जगह उपलब्ध हैं। किसी भी शंका या असामान्य लक्षण की स्थिति में देर न करते हुए सीधे अस्पताल से संपर्क करना हमेशा बेहतर रहता है।









